जल संपदा सहेजने का समय

जल संपदा सहेजने का समय

इन कहावतों को हम सब अक्सर ही सुनते हैं- ‘जल ही जीवन है।’ ‘बिन पानी सब सून।’ इन कहावतों का आशय यह है कि पृथ्वी पर जीवन का आधार यहां मौजूद जल ही है। इसके अभाव में पूरी धरती एक रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगी। हम भाग्यशाली हैं कि इस ब्रrांड में पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जो जल संपदा से परिपूर्ण है, लेकिन हम इंसानों की नासमझी के कारण यह जल संपदा दिनोंदिन न सिर्फ कम होती जा रही है, बल्कि प्रदूषित भी होती जा रही है। इस संपदा पर आज संकट के बादल मंडरा रहे हैं। चूंकि जल पर जीवन निर्भर है इसलिए यह कह सकते हैं कि इसके साथ हमारा जीवन भी संकटग्रस्त होता जा रहा है। यह खतरा दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है और भविष्य में इसके और भी गहराने के आसार दिख रहे हैं। समय रहते इससे निजात पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में जल संरक्षण को एक जन आंदोलन बनाने का सुझाव दिया है। पानी की यह समस्या जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते और गहरा गई है। प्रति वर्ष प्राय: एक जून को केरल में मानसून का प्रवेश हो जाता था, पर इस बार अल नीनो प्रभाव के चलते उसने 8 जून को देश में प्रवेश किया। यह विलंब क्यों? मानसून में इस देरी की एक वजह बढ़ता प्रदूषण और इसके चलते हुआ जलवायु परिवर्तन भी है।

देश में जल के गहराते संकट को देखते हुए मोदी सरकार ने ‘जल शक्ति मंत्रलय’ का गठन किया है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में भी ग्राम स्वराज्य के तहत यह घोषणा की है कि वह 2024 तक सभी घरों में शौचालय के साथ ही साथ प्रत्येक घर को ‘नल से जल’ की आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। सवाल यह उठता है कि घरों में जल की आपूर्ति के लिए वह जल कहां से लाएगी? क्या घरों में जलापूर्ति के लिए सरकार भी बोरिंग कर भूमिगत जल का ही उपयोग करने वाली है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि देश के कुछ हिस्सों में भूमिगत जल का स्तर विगत चार दशक में 20 से 50 फीट तक नीचे चला गया है। देश के कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अप्रैल आते-आते ताल-तलैया के साथ ही साथ हैंडपंप भी सूख जा रहे हैं। इसके तात्कालिक उपाय के रूप में राज्यों की सरकारें हैंडपंप की गहराई बढ़ाती जा रही हैं, पर चूंकि भूगर्भ जल तेजी से नीचे जा रहा है अत: पेयजल का संकट दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है। देखा जाए तो तीन तरफ से समुद्र और उत्तर में हिमालय से घिरे राष्ट्र के समक्ष आज जो जल संकट पैदा हुआ है वह हमारी अपनी देन है। वास्तव में हमने जल संरक्षण के अपने पारंपरिक तौर-तरीकों को भुला दिया है। गांवों-देहातों में आज भी यह कहावत प्रचलित है, ‘ऊपर का जल ऊपर के लिए और नीचे का जल पीने के लिए।’ अर्थात दैनिक नित्यकर्म जैसे कि शौच, स्नान, कपड़े धोने, पशुओं और कृषि कार्य हेतु वर्षा के जल का उपयोग किया जाता था और खाना बनाने और पीने के लिए भूमिगत जल का, जो कुओं से निकाला जाता था। वर्षा जल के संग्रह के लिए बावड़ी, तालाब आदि थे, जिनकी देखभाल की जबावदेही सभी की थी। हिमालय से निकलने वाली नदियों में भी साल भर शुद्ध जल का प्रवाह पर्याप्त मात्र में रहता था।

एक समय हिमालय पर बरगद, पाकड़, जामुन, महुआ आदि फलदार और जड़दार पेड़ होते थे जो अपनी जड़ों से मिट्टी को बांधे रहते थे। वर्षा के समय इन्हीं वृक्षों की जड़ों के कारण बारिश का पानी हिमालय में रुका रहता था और फिर धीरे-धीरे कर रिसते हुए नदियों में बहता रहता था, लेकिन अंग्रेजों ने रेलवे की पटरी के लिए वैसे वृक्षों को हिमालय में विकसित किया जो रेलवे की पटरी के लिए काम तो आते थे, पर उनकी छाया के नीचे घास भी पैदा नहीं होती थी। हमारी उपेक्षा और वनों की अंधाधुंध कटाई से हिमालय में धीरे-धीरे जड़दार वृक्ष खत्म हो गए। परिणाम हमारे सामने है। वर्षा के समय जल के साथ ही हिमालय से मिट्टी और गाद के कारण नदियों में सिल्ट की समस्या पैदा हो रही है। नदियों में जल प्रवाह और जल की मात्र में तेजी से कमी आ गई है। जलप्रवाह घटने और नगरीय संस्कृति के प्रभाव में सीवरेज और गंदे जल को प्रवाहित करने से नदियां इतनी प्रदूषित हो गई हैं कि मनुष्य की बात तो छोड़ ही दीजिए, पशु-पक्षी भी उस जल का उपयोग नहीं करते। जल संकट का दूसरा सबसे बड़ा कारण है आधुनिकता और सुविधा युक्त हमारी जीवन शैली। एक व्यक्ति शौच और लघुशंका के लिए जब-जब शौचालय जाता है तब-तब फ्लश चलाता है। इस दौरान वह लगभग 4-5 लीटर शुद्ध पानी को गंदे नाले में बहा देता है। प्रति व्यक्ति यह बर्बादी कम से कम 30-35 लीटर प्रतिदिन तो है ही। पहले नदी या तालाब में स्नान करने के साथ ही साथ वहां कपड़े भी धो लिए जाते थे। आजकल घरों में वाशिंग मशीन आ गई है। वाशिंग मशीन में कितने जल का इस्तेमाल होता है, इसका कोई हिसाब नहीं। पेयजल के लिए घरों में लगी ‘आरओ’ मशीन एक लीटर पानी साफ करती है और आधा लीटर बेकार बहाती है। देश में उत्पन्न जल संकट का एक और बड़ा कारण है बोरिंग। आज गांवों से लेकर शहरों तक बोरिंग के माध्यम से भूमिगत जल का तेजी से दोहन हो रहा है। सरकारें भी कृषि कार्य के लिए किसानों को बोरिंग पर सब्सिडी दे रही हैं। बोरिंग के कारण घटते भूमिगत जलस्तर का प्रभाव पेयजल के लिए लगाए गए हैंडपंप और कुओं पर पड़ रहा है।

हालांकि इधर के वर्षो में भूमिगत जल को ‘रीचार्ज’ करने और ‘अपशिष्ट’ जल के पुनर्प्रयोग पर ध्यान दिया जा रहा है, पर यह समस्या के समाधान की दृष्टि से यह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है। जल संरक्षण के लिए सरकार को सबसे पहले बोरिंग के उपयोग के बारे में कोई नीतिगत निर्णय लेना होगा। कृषि के लिए नहर, तालाब या अन्य विकल्पों की तलाश करने के साथ ही दैनिक जीवन में आए परिवर्तन के कारण बर्बाद हो रहे जल के पुनर्प्रयोग की योजना को कड़ाई से लागू करना होगा, वरना यह संकट जल्द ही ‘जल युद्ध’ का रूप अख्तियार कर सकता है।

(लेखक बिहार विधानपरिषद के पूर्व सदस्य हैं)

dainik jagaran