जलवायु वार्ता में विकसित देशों की अड़चन

जलवायु वार्ता में विकसित देशों की अड़चन

जलवायु वार्ता में विकसित देशों की अड़चन

जब अमेरिका समेत कई बड़े देश अपने वादे से मुकरते जा रहे है ,विकासशील देशों की राह कठिन होती जा रही है ।

विकसित देशों के रवैये से पोलैंड मे अगले महीने होने वाली जलवायु परिवर्तन वार्ता के विफल होने के आसार पैदा हो गए है ।बैठक में पेरिस समझौते के क्रियान्वयन के लिए आगे की रणनीति बननी है ।साथ ही पेरिस रुलबुक को भी अंतिम रुप दिया जाना है ।लेकिन जिस प्रकार एख के बाद एख विकसित देश उत्सर्जन के अपे लक्ष्यों को टालने लगे है और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे है उससे मुश्किल पैदा हो सकती है ।दरअसल ,कांप्रेंस ऑफ पार्टी की यह 24वीं बैठक कई मामलो मे अहम है।इशसे पेरिस समझौते के क्रियान्वयन के लिए रुलबुक को मंजूरी दी जान है ।इस रुलबुक के जरिये तय होगा कि पेरिस समझौते की घोषणाओं के क्रियान्वयन कैसे और कब होगा । लक्ष्य हर हाल में 2020 तक पेरिस समझौता लागू करने का है ।

इस बैठक  के अचानक ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाने कीकुछ और वजहें है । जैसे ,आईपीसीस की हालिया रिपोर्ट में तापमान बढ़ोत्तरी का 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की बात कही गई है ।जबकि पेरिस समझौते मे इसे दो डिग्री से नीचे रखने की बात कही गई है ।लेकिन 1.5 डिग्री के विशिष्ट के मद्देनजर राष्ट्रों को अपने उत्सर्जन के लक्ष्यों को बदलना पड़ सकता है ।इसमे भी पहल विकसित देशों करनी होगी।पर ऐसी उम्मीद कम ही है ।दूसरे विकसित देशों को हरित कोष के लिए दी जाने वाली सहायता राशि मे भी बढ़ोत्तरी करनी होगी,तभी गरीब औऱ विकासशील देश अपे लक्ष्य हासिल कर सकेंगे।लेकिन विकसित देश पुरानी प्रतिबद्धता को ही पूरा करने मे विफल रहे है ।

बैठक का एजेंडा जितना महत्वपूर्ण है,उस पर सहमति बैठाना उतना ही कठिन होता दिख रहा है ।रुलबुक को लागू करने पर गरीब और विकासशील देशो को कोई ऐतराज नहीं है ।वे अपने तय लक्ष्यों के अनुरुप कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध भी हैं।लेकिन जब पेरिस समझौते में सभी देशो ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी और राष्ट्रीय लक्ष्यों की घोषणा की थी,तब विकसित देशों ने 2020 तक हरित कोष में 100 अरब डॉलर की राशि देने का एलान किया था।लेकिन आज तक यह कोष 20 अरब डॉलर तक भी नही पहुंच सका है ।अमेरिका के बाद कई और देश भी तेवर दिखा रेह हैं।सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाला अमेरिका खुद पेरिस समझौते को तोड़कर अलग हो चुका है ।ऑस्ट्रेलिया ने जो लक्ष्य पहले घोषित किए थे,अब उनसे पीछे हटने का ऐलान कर दिया है ।जबकि जर्मनी ने कह दिया है कि लक्ष्यों को हासिल कर पाना उसके लिए संभव नही है ।बाकी यूरोपीय देश तो अभी ट्रैक पर हैं,लेकिन अमेरिका वगैरह की मनमानी उन्हें भी उकसा सकती है ।ऐसे मे, फिर कोष में धन  कहां से आएगा। इसी हरित कोष की उपलब्धता पर रुलबुक की सहमति टिकी है ।मौजूदा स्थितियों में माना जा रहा है कि विकासशील औऱ गरीब देशों के लिए पेरिस रुलबुक पर हामी भरना आसान नहीं होगा।यदि भारत,चीन जैसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्रों को छोड़ दिया जाए,तो बाकी विकासशील और गरीब देशों के लिए बिना किसी वित्तीय मदद के उत्सर्जन में कमी लाना बेहद कठिन काम है । भारत ने उत्सर्जन की तीव्रता मे 35 फीसदी की कमी का एलान कर पेरिस समझौते पर बढ़ने के संकेत तभी दे दिए थे।लेकिन जिस प्रकार की कई कठिन चुनौतियां सामने है ।जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए भारत अन्य समूहों की मदद से विकसित देशों पर दबाब बनाएगा।

पोलैंड बैठक से पूर्व हाल में दिल्ली में बेसिक देशो की बैठक मे भी भारत ने इसी रुख को स्पष्ट किया था।बेसिक देशों ने कहा कि विकसित देश यदि वित्तीय योगदान का भरोसा अभी नहीं दे सकते , तो उन्हें 2020 के बाद भी समय दिया जाना चाहिए।जलवायु परिवर्तन को लेकर एक अहम विषय और है, जिस पर इस बैठक में विचार होना है।जलवायु परिवर्तन को लेकर एक अहम विषय और है ,जिस पर इस बैठक में विचार होना है ।जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते तबाही मचाने वाली आपदाएं आ रही है।इससे हुई क्षति की भरपाई का एक तंत्र विकसित करने की बात चल रही है  ताकि जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वालों को तुरंत मदद मिल सके।

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